Chapter 3 · Verse 15

Path of Selfless Service

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्
brahmodbhavaṁ brahmākṣhara-samudbhavam sarva-gataṁ nityaṁ

Word Meanings

karma brahma udbhavam viddhi brahma akṣhara samudbhavam tasmāt sarva-gatam brahma nityam yajñe pratiṣhṭhitam

Translation

कर्म वेद (ब्रह्म) से उत्पन्न होता है और वेद अविनाशी परमात्मा से प्रकट हुआ है। इसलिए सर्वव्यापी परमात्मा सदैव यज्ञ (निःस्वार्थ कर्म) में प्रतिष्ठित है।

Commentary

व्याख्या--'अन्नाद्भवन्ति भूतानि'--प्राणोंको धारण करनेके लिये जो खाया जाता है, वह 'अन्न' (टिप्पणी प0 136.2) कहलाता है। जिस प्राणीका जो खाद्य है, जिसे ग्रहण करनेसे उसके शरीरकी उत्पत्ति, भरण और पुष्टि होती है, उसे ही यहाँ 'अन्न' नामसे कहा गया है; जैसे--मिट्टीका कीड़ा मिट्टी खाकर जीता है तो मिट्टी ही उसके लिये अन्न है।जरायुज (मनुष्य, पशु आदि), उद्भिज्ज (वृक्षादि), अण्डज (पक्षी सर्प चींटी आदि) और स्वेदज (जूँ आदि)--ये चारों प्रकारके प्राणी अन्नसे ही उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न होकर अन्नसे ही जीवित रहते हैं (टिप्पणी प0 137.1)।