Chapter 12 · Verse 12

The Yoga of Devotion

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते।ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्
śhreyo abhyāsāj jñānād dhyānaṁ karma-phala-tyāgas tyāgāch chhāntir

Word Meanings

śhreyaḥ hi jñānam abhyāsāt jñānāt dhyānam viśhiṣhyate dhyānāt karma-phala-tyāgaḥ tyāgāt śhāntiḥ anantaram

Translation

अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है, और ध्यान से भी कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है — क्योंकि त्याग से तुरंत परम शान्ति मिलती है।

Commentary

व्याख्या--[भगवान्ने आठवें श्लोकसे ग्यारहवें श्लोकतक एक-एक साधनमें असमर्थ होनेपर क्रमशः समर्पण-योग, अभ्यासयोग, भगवदर्थ कर्म और कर्मफल-त्याग--ये चार साधन बताये। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि क्रमशः पहले साधनकी अपेक्षा आगेका साधन नीचे दर्जेका है, और अन्तमें कहा गया कर्मफलत्यागका साधन सबसे नीचे दर्जेका है। इस बातकी पुष्टि इससे भी होती है कि पहलेके तीन साधनोंमें भगवत्प्राप्तिरूप फलकी बात ('निवसिष्यसि मय्येव' , मामिच्छाप्तुम्' तथा 'सिद्धिमवाप्स्यसि' -- इन पदोंद्वारा) साथ-साथ कही गयी; परन्तु ग्यारहवें श्लोकमें जहाँ कर्मफलत्याग करनेकी आज्ञा दी गयी है, वहाँ उसका फल भगवत्प्राप्ति नहीं बताया गया।