Chapter 2 · Verse 41

Transcendental Knowledge

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्
vyavasāyātmikā buddhir ekeha bahu-śhākhā hyanantāśh buddhayo ’vyavasāyinām

Word Meanings

vyavasāya-ātmikā buddhiḥ ekā iha kuru-nandana bahu-śhākhāḥ hi anantāḥ cha buddhayaḥ avyavasāyinām

Translation

हे कुरुनन्दन! इस मार्ग पर निश्चयात्मक बुद्धि एक ही होती है, परन्तु जिनका मन स्थिर नहीं है, उनकी बुद्धि अनेक शाखाओं में बँटी और अनन्त होती है।

Commentary

व्याख्या-- 'व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन'-- कर्मयोगी साधकका ध्येय (लक्ष्य) जिस समताको प्राप्त करना रहता है, वह समता परमात्माका स्वरूप है। उस परमात्मस्वरूप समताकी प्राप्तिके लिये अन्तःकरणकी समता साधन है, अन्तःकरणकी समतामें संसारका राग बाधक है। उस रागको हटानेका अथवा परमात्मतत्त्वको प्राप्त करनेका जो एक निश्चय है, उसका नाम है--व्यवसायात्मिका बुद्धि। व्यवसायात्मिका बुद्धि एक क्यों होती है? कारण कि इसमें सांसारिक वस्तु, पदार्थ आदिकी कामनाका त्याग होता है। यह त्याग एक हीहोता है, चाहे धनकी कामनाका त्याग करें चाहे मान-बड़ाईकी कामनाका त्याग करें। परन्तु ग्रहण करनेमें अनेक चीजें होती है क्योंकि एकएक चीज अनेक तरहकी होती है; जैसे--एक ही मिठाई अनेक तरहकी होती है। अतः इन चीजोँकी कामनाएं भी अनेक, अनन्त होती हैं।