Chapter 7 · Verse 1

Self-Knowledge and Enlightenment

श्री भगवानुवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः। असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु
śhrī bhagavān uvācha mayyāsakta-manāḥ yogaṁ mad-āśhrayaḥ asanśhayaṁ samagraṁ māṁ tach chhṛiṇu

Word Meanings

śhrī-bhagavān uvācha mayi āsakta-manāḥ pārtha yogam yuñjan mat-āśhrayaḥ asanśhayam samagram mām yathā jñāsyasi tat śhṛiṇu

Translation

श्री भगवान बोले — हे पार्थ! मुझमें मन लगाकर, मेरा आश्रय लेकर, योग का अभ्यास करते हुए तुम मुझे पूरी तरह और बिना किसी संदेह के जिस प्रकार जानोगे, वह सुनो।

Commentary

व्याख्या--'मय्यासक्तमनाः'--मेरेमें ही जिसका मन आसक्त हो गया है अर्थात् अधिक स्नेहके कारण जिसका मन स्वाभाविक ही मेरेमें लग गया है, चिपक गया है, उसको मेरी याद करनी नहीं पड़ती, प्रत्युत स्वाभाविक मेरी याद आती है और विस्मृति कभी होती ही नहीं--ऐसा तू मेरेमें मनवाला हो।जिसका उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका और शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्धका आकर्षण मिट गया है, जिसका इस लोकमें शरीरके आराम, आदर-सत्कार और नामकी ब़ड़ाईमें तथा स्वर्गादि परलोकके भोगोंमें किञ्चिन्मात्र भी खिंचाव, आसक्ति या प्रियता नहीं है, प्रत्युत केवल मेरी तरफ ही खिंचाव है, ऐसे पुरुषका नाम 'मय्यासक्तमनाः' है।