Chapter 6 · Verse 9

Path of Meditation

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु। साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते
suhṛin-mitrāryudāsīna-madhyastha-dveṣhya-bandhuṣhu sādhuṣhvapi sama-buddhir

Word Meanings

su-hṛit mitra ari udāsīna madhya-stha dveṣhya bandhuṣhu sādhuṣhu api cha pāpeṣhu sama-buddhiḥ viśhiṣhyate

Translation

जो व्यक्ति मित्र, शत्रु, उदासीन, तटस्थ, द्वेषी और सम्बन्धियों में तथा अच्छे और बुरे लोगों में भी समान भाव रखता है, वह सबसे श्रेष्ठ है।

Commentary

व्याख्या--[आठवें श्लोकमें पदार्थोंमें समता बतायी, अब इस श्लोकमें व्यक्तियोंमें समता बताते हैं। व्यक्तियोंमें समता बतानेका तात्पर्य है कि वस्तु तो अपनी तरफसे कोई क्रिया नहीं करती; अतः उसमें समबुद्धि होना सुगम है, परन्तु व्यक्ति तो अपने लिये और दूसरोंके लिये भी क्रिया करता है; अतः उसमें समबुद्धि होना कठिन है। इसलिये व्यक्तियोंके आचरणोंको देखकर भी जिसकी बुद्धिमें, विचारमें कोई विषमता या पक्षपात नहीं होता, ऐसा समबुद्धिवाला पुरुष श्रेष्ठ है।]