Chapter 6 · Verse 7

Path of Meditation

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः। शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः
jitātmanaḥ paramātmā śhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu mānāpamānayoḥ

Word Meanings

jita-ātmanaḥ praśhāntasya parama-ātmā samāhitaḥ śhīta uṣhṇa sukha duḥkheṣhu tathā māna apamānayoḥ

Translation

जिसने अपने मन पर विजय पा ली है और जो सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख तथा मान-अपमान में शांत रहता है, ऐसे व्यक्ति के हृदय में परमात्मा सदा विराजमान हैं।

Commentary

व्याख्या--[छठे श्लोकमें'अनात्मनः' पद और यहाँ 'जितात्मनः' पद आया है। इसका तात्पर्य है कि जो 'अनात्मा' होता है, वह शरीरादि प्राकृत पदार्थोंके साथ 'मैं 'और 'मेरा'-पन करके अपने साथ शत्रुताका बर्ताव करता है और जो 'जितात्मा' होता है, वह शरीरादि प्राकृत पदार्थोंसे अपना सम्बन्ध न मानकर अपने साथ मित्रताका बर्ताव करता है। इस तरह अनात्मा मनुष्य अपना पतन करता है और जितात्मा मनुष्य अपना उद्धार करता है।]'जितात्मनः' जो शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि किसी भी प्राकृत पदार्थकी अपने लिये सहायता नहीं मानता और उन प्राकृत पदार्थोंके साथ किञ्चिन्मात्र भी अपनेपनका सम्बन्ध नहीं जोड़ता, उसका नाम 'जितात्मा' है। जितात्मा मनुष्य अपनी तो हित करता ही है, उसके द्वारा दुनियाका भी बड़ा भारी हित होता है।